चेहरा
उम्र गुज़र गयी आईना साफ़ करते करते |
गौर से देखा तो पाया कि चेहरे पे धूल थी ||
Friday, April 23, 2010
Tuesday, April 20, 2010
हमें तो काटनी है शाम-ए-ग़म में ज़िन्दगी अपनी
जहाँ वो हों वहाँ ऐ चांद ले जा चाँदनी अपनी
तमन्ना थी तो बस ये थी तमन्ना आख़िरी अपनी
कि वो साहिल पे होते और कश्ती डूबती अपनी
--’शीरी' भोपाली
***
दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की
लोगों ने घर के सहन में रस्ते बना लिए!
--सिब्ते-अली ’सबा’
****
अजब तर्कीब से साने ने रख्खी है बिना इस की
कि सदिया हो गयी इक ईंट भी इसकी नहीं खिसकी
लगी रहती है आमद-रफ़्त जिसमें रोज़ जिस-तिस की
वही रौनक है जिसकी और वही दिलचस्पियाँ जिसकी
यह दुनिया या इलाही !जल्वा गाह-ए-नाज़ है किस की
हज़ारो उठ गये ,रौनक़ वही है आज तक इस की
--"नादिर" काकोरवी
****
रिन्द-ए-ख़राब हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू
यह तंग-नाये-देह्र नहीं मंज़िल-ए-फ़राग (दह्र= समय मंज़िल-ए-फ़राग=मुक्ति की मंज़िल)
गाफ़िल! ना पाँव हिर्स के फैला,सुकेड़ तू (हिर्स=लालच)
उल्फ़त का गर है नख़्ल तो सरसब्ज़ होयेगा (नख़्ल= पेड़)
सौ बार जड़ से फ़ेंक दे उस को उखेड़ तू
आवारगी से कू-ए-मोहब्बत के हाथ उठा
अए ज़ौक ! ये उठा न सकेगा खुखेड़ तू
--ज़ौक
****
होश-ओ-हवास ताब-ओ-तावाँ ’दाग़’ जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं ,सामान तो गया
--’दाग़’ देहलवी
****
लाई हयात आये ,क़ज़ा ले चली ,चले !
अपनी खु़शी न आये ,न अपनी खु़शी चले
बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल-लगी चले ?
दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो यूँ ही ,जब तक चली चले
--ज़ौक
जहाँ वो हों वहाँ ऐ चांद ले जा चाँदनी अपनी
तमन्ना थी तो बस ये थी तमन्ना आख़िरी अपनी
कि वो साहिल पे होते और कश्ती डूबती अपनी
--’शीरी' भोपाली
***
दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की
लोगों ने घर के सहन में रस्ते बना लिए!
--सिब्ते-अली ’सबा’
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अजब तर्कीब से साने ने रख्खी है बिना इस की
कि सदिया हो गयी इक ईंट भी इसकी नहीं खिसकी
लगी रहती है आमद-रफ़्त जिसमें रोज़ जिस-तिस की
वही रौनक है जिसकी और वही दिलचस्पियाँ जिसकी
यह दुनिया या इलाही !जल्वा गाह-ए-नाज़ है किस की
हज़ारो उठ गये ,रौनक़ वही है आज तक इस की
--"नादिर" काकोरवी
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रिन्द-ए-ख़राब हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू
यह तंग-नाये-देह्र नहीं मंज़िल-ए-फ़राग (दह्र= समय मंज़िल-ए-फ़राग=मुक्ति की मंज़िल)
गाफ़िल! ना पाँव हिर्स के फैला,सुकेड़ तू (हिर्स=लालच)
उल्फ़त का गर है नख़्ल तो सरसब्ज़ होयेगा (नख़्ल= पेड़)
सौ बार जड़ से फ़ेंक दे उस को उखेड़ तू
आवारगी से कू-ए-मोहब्बत के हाथ उठा
अए ज़ौक ! ये उठा न सकेगा खुखेड़ तू
--ज़ौक
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होश-ओ-हवास ताब-ओ-तावाँ ’दाग़’ जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं ,सामान तो गया
--’दाग़’ देहलवी
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लाई हयात आये ,क़ज़ा ले चली ,चले !
अपनी खु़शी न आये ,न अपनी खु़शी चले
बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल-लगी चले ?
दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो यूँ ही ,जब तक चली चले
--ज़ौक
वह
वह हर गली नुक्कड़ पर तन कर खड़ा था। लोग आते जाते सिर नवाते, चद्दर चढ़ाते उसको। दीमक ने अपना महल बना लिया था, अन्दर ही अन्दर उसके। मैंने जब वरदान माँगा, तो वह ढह गया।
Monday, March 15, 2010
Friday, August 21, 2009
सर झुका के
सर उठा के मैंने कितनी ख्वाहिशें की थी
कितने ख्वाब देखे थे, कितनी कोशिशें की थी
जब तू रूबरू आया, नज़रें ना मिला पाया
सर झुका के उस इक पल मैंने क्या नहीं पाया
कितने ख्वाब देखे थे, कितनी कोशिशें की थी
जब तू रूबरू आया, नज़रें ना मिला पाया
सर झुका के उस इक पल मैंने क्या नहीं पाया
Saturday, May 30, 2009
Stand up
जिसे कुछ कर दिखाना है, चले वो वक्त से आगे
किसी ने वक्त को उसके ही संग चलकर नही बदला
---
If you dream to fly with the Eagles don’t waste your time swimming with the Ducks !
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किसी ने वक्त को उसके ही संग चलकर नही बदला
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If you dream to fly with the Eagles don’t waste your time swimming with the Ducks !
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Thursday, May 21, 2009
माँ
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
वो तो लिखा के लाई है क़िस्मत में जागना
माँ कैसे सो सकेगी कि बेटा सफ़र में है
ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
जरा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए
दिए से मेरी मां मेरे लिए, काजल बनाती है
जब कभी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे चुपके चुपके कर देती थी जाने कब तुरपाई अम्मा
बाबू जी गुज़रे, आपस में- सब चीज़ें तक़सीम हुई तब- मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से आई अम्मा
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
वो तो लिखा के लाई है क़िस्मत में जागना
माँ कैसे सो सकेगी कि बेटा सफ़र में है
ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
जरा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए
दिए से मेरी मां मेरे लिए, काजल बनाती है
जब कभी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे चुपके चुपके कर देती थी जाने कब तुरपाई अम्मा
बाबू जी गुज़रे, आपस में- सब चीज़ें तक़सीम हुई तब- मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से आई अम्मा
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